Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya

अकबर बीरबल की मजेदार कहानियां हिंदी में मज़ेदार किस्सों को पढ़े

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya, जब कहानियों, चुटकुलों और मजेदार कहानियों की बात आती है, तो अकबर बीरबल की कहानियों का उल्लेख सबसे पहले आता है। दुनिया में ऐसे कई किस्से हैं जो पढ़ते ही हंसी के साथ-साथ शिक्षा भी प्राप्त होती है,
तो आइए सभी पढ़ते हैं अकबर बीरबल की 5 मजेदार कहानियां, अकबर बीरबल की कहानी, जो आप सभी को हंसाएगी और साथ में हमें इन कहानियों से नैतिक शिक्षा भी मिलेगी, तो आइए पढ़ते हैं अकबर बीरबल की 5 ऐसी मजेदार कहानियां। ..

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya | अकबर बीरबल की मजेदार कहानियां हिंदी में मज़ेदार किस्सों को पढ़े

अकबर बीरबल की 5 ऐसी मजेदार कहानियां

  • (1) जान से प्यारा कुछ नहीं
  • (2) मुल्ला की पगड़ी
  • (3) जाओ बुला लाओ
  • (4) बीरबल को देश निकाला
  • (5) बुद्धि की परीक्षा

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya (1)

अकबर बीरबल की कहानी


जान से प्यारा कुछ नहीं


बादशाह अकबर सभासदों और विद्वानों की परीक्षा लेने के लिए नित नए और अनोखे प्रश्न किया करते थे। एक दिन उन्होंने सभी से एक प्रश्न किया

“इंसान के लिए सबसे प्यारी चीज क्या है ?” किसी ने कहा- “सबसे प्यारी चीज़ खुदा है।”

दूसरा बोला-“हुजूर, सबसे प्यारे आप हैं। ” “सबसे प्यारी सन्तान होती है” मुल्ला दो प्याजा ने कहा।

“दौलत से प्यार किसको नहीं है इससे हर चीज खरीदी जा सकती है। अत: इंसान दौलत से सबसे अधिक प्यार करता है। “

सभी का उत्तर सुनकर बादशाह ने बीरबल की ओर देखा-बीरबल ने अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया था। वे अभी भी खामोश बैठे सोच रहे थे।

“बीरबल।” ‘जहाँपनाह!”

‘तुमने कोई उत्तर नहीं दिया।” जहाँपनाह ! ” सबसे प्यारी चीज होती है। जान।” बीरबल ने बताया।

“नहीं हमें मुल्ला दो-प्याजा का उत्तर जंच रहा है। इंसान हो या जानवर, उसके लिए अपनी संतान ही सबसे अधिक प्रिय है। “

पर अपना-अपना ख्याल है जहाँपनाह! मैंने ऐसे मंजर भी देखे हैं कि वक्त आने प्राणी संतान की भी परवाह नहीं करता और अपनी जान बचाता है।

“सिद्ध कर सकते हो ?”

“जी हां, मैं सिद्ध कर सकता हूँ।”

उधर मुल्ला दो प्याजा यह सोचकर बेहद खुश था कि पहला मौका है जब बादशाह ने उसके जवाब को बीरबल से श्रेष्ठ बताया है। अतः वह इनाम और सम्मान पाने की कल्पना में खो गया। दूसरी ओर अपनी बात को सत्य सिद्ध करने के प्रयास में दूसरे दिन ही बीरबल ने किले के टैंक का पानी निकलवाकर उसे खाली कर दिया। उस खाली टैंक में एक बन्दरिया को छुड़वा दिया, जिसके पेट पर बच्चा चिपका हुआ था।

फिर धीरे-धीरे उस टैंक में पानी छुड़वाना शुरू कर दिया। बंदरिया सूखे में खड़ी हो गयी, जोकि सबसे ऊँची जगह थी। जब उस ऊँची जगह में भी पानी आ गया और बन्दरिया के पेट पर चिपका बच्चा भीगने लगा तो बंदरिया ने उस बच्चे को पीठ पर लाद दिया। पानी भरता जा रहा था। बंदरिया बच्चे के लिए खड़ी रही। पानी तेजी से भर रहा था। जब पानी बंदरिया की पीठ तक भी आने लगा तो उसने बच्चे को सिर पर उठा लिया। पानी बढ़ता जा रहा था।

यहाँ तक कि बंदरिया डूबने लगी। उसके सिर तक पानी पहुँच गया। उसके पैर भी उखड़ने लगे। तब उसने अपने आपको बचाने के लिए उस बच्चे को नीचे फेंक दिया और स्वयं बच्चे के ऊपर खड़ी हो गयी।

यह देखकर बादशाह अकबर की आँखें खुल गईं। जिस बच्चे को बचाने के लिए वह कुछ देर पहले तक जी-जान से संघर्ष कर रही थी। अब अपनी जान पर बनी देखकर उसने उसी बच्चे को अपनी जान बचाने का माध्यम बना लिया। सच है जान है तो जहान है।

वह मान गये कि सबसे प्यारी जान होती है। अपनी जान संकट में देख कोई भी प्राणी किसी की परवाह नहीं करता। “तुम्हारी बात सही है-बीरबल । “

बीरबल ने मुस्कराकर कहा- “देखा आपने। “

“जहाँपनाह, संसार में हज़ारों में एक ऐसा होता है जो प्राणों की बाजी लगाकर किसी की प्राण रक्षा कर सकता है। अधिकांश तो ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी जान की ही अधिक परवाह रहती है। ऐसे भी प्राणी हैं, जो भूख से अधिक पीड़ित होने पर संतान का ही भक्षण कर जाते हैं, कुछ प्राणी तो होते ही ऐसे हैं, अकाल पड़ने पर मनुष्य को भी मनुष्य का, अपनी संतान तक का भक्षण करते देखा गया है। इसीलिए मैंने कहा था। कि सबसे प्यारी चीज अपनी जान है।”

“सच कहते हो।” ऐसा कहकर अकबर बादशाह ने अपने हाथ की अंगूठी बीरबल को देकर कहा – “यह तुम्हारा इनाम। “

यह देखकर मुल्ला-प्याजा के सीने पर सांप लोट गए। अगर बीरबल यह सब न करता तो इनाम की इस वेश-कीमती अंगूठी का अधिकारी वही होता। मगर अब पछताए का होत है।

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Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya (2)


मुल्ला की पगड़ी – अकबर बीरबल की कहानी


एक दिन बादशाह अकबर ने सभा में बैठे हुए बीरबल के पगड़ी बांधने की कला की तारीफ की। उसी सभा में मुल्ला दो प्याजा और अन्य दरबारी गण भी उपस्थित थे। मुल्ला साहब को बीरबल की तारीफ सुनकर अच्छा नहीं लगा और वह मन ही मन में कहने लगा कि इसमें कौन सी बड़ी बुद्धिमानी है, जिसकी इतनी बढ़ाई हो रही है। इससे कहीं अच्छी पगड़ी तो मैं भी बांध सकता हूँ।

बादशाह ने प्रसन्न होकर अगले दिन मुल्ला को अपनी कला प्रदर्शित करने को कहा तथा दरबार के सब कार्यों को निपटाकर बादशाह महल में चले गए।

मुल्ला मन-ही-मन बहुत प्रसन्न था। दूसरे दिन वह प्रातः काल जल्दी उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो सभा में सबसे पहले ही जा पहुँचे। जब दरबारी सभा में आने लगे, तो वे देखते ही मुल्ला की पगड़ी की तारीफ करते। अन्त में बीरबल भी बादशाह के साथ आ पहुँचे।

बादशाह ने जब मुल्ला की पगड़ी देखी तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई और मुल्ला की पगड़ी की तारीफ करते हुए बोले-“यह तो बीरबल की पगड़ी से सचमुच कहीं अच्छी बंधी है।” यह सुनकर बीरबल तपाक् से बोले- “जहाँपनाह ! यह मुल्ला साहब की करामात नहीं है बल्कि इनकी स्त्री की है। वास्तव में तारीफ के योग्य इनकी स्त्री है, न कि मुल्ला। उसी के सहयोग से इन्हें आज यह सम्मान प्राप्त हुआ है ।

यदि मेरी बात सत्य नहीं है तो मुल्ला साहब अपनी पगड़ी खोल दें और आपके सामने दोबारा बांधे। यदि ऐसी सुन्दर पगड़ी दोबारा बांध लेंगे तो ठीक है अन्यथा फिर यह समझा जाएगा कि इन्होंने अपनी स्त्री से बंधवाई है।”

बादशाह ने बीरबल की बात मान ली और मुल्ला साहब को पगड़ी उतार कर दोबारा बांधने का हुक्म दिया। मुल्ला ने पगड़ी उतार ली, किन्तु वे बिना शीशे के पगड़ी नहीं बांध सकते थे। उन्हें इधर-उधर झांकते हुए देखकर बीरबल बोले- “क्यों साहब! क्या चाहिए ?” मुल्ला

मुल्ला कुछ न बोल सके और अपनी पगड़ी बांधना शुरू किया, शीशा न देखने के कारण उन्होंने जो पगड़ी बांधी उससे सब दरबारी बादशाह हंस पड़े। मुल्ला बेचारे बहुत लज्जित हुए। बादशाह ने मन ही मन बीरबल की तारीफ की।

बादशाह मुस्कराकर बोले- “वाह मुल्ला साहब, आपने तो कमाल ही कर दिया, जो काम आप स्वयं न कर सकते, वह अपनी स्त्री से करवाते हैं।”

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya in Hindi (3)


जाओ बुला लाओ – अकबर बीरबल की मजेदार कहानी


एक रोज बादशाह सलामत सोकर उठे और उठते ही हुक्म जारी किया ‘बुलाकर लाओ।” आगे कुछ नहीं बताया।

सेवक ने भी कुछ नहीं पूछा। उसका साहस भी नहीं हुआ था। उसकी समझ में कुछ नहीं आया था कि वह किसे बुलाकर लाये ? वह तो बादशाह का हुक्म बजाने चल दिया। अपने सभी मित्रों से पूछा कि बादशाह ने किसे बुलाया है, मगर कोई भी नहीं बता सका कि वह किसे बुलाये।

अन्त में वह परेशान होकर बीरबल के पास पहुँचा और जाते ही बीरबल के पैरों में लेट गया और गिड़गिड़ाया-“हुजूर, मेरी मदद करो, मैं बड़े संकट में फंस गया

“बताओ तो बात क्या है ?” बीरबल ने पूछा।

“बात यह है हुजूर, बादशाह ने नींद से जागते ही हुक्म दिया कि जाओ बुला लाओ। अब मैं किसे बुला ले आऊँ यह समझ में नहीं आता।’

“सोकर उठते ही हुक्म दिया।”

“जी।”

‘उस समय क्या कर रहे थे ?”

‘जी, दाढ़ी खुजा रहे थे।” “तो जाओ, जल्दी से नाई को बुलाकर ले जाओ, वे दाढ़ी बनवाना चाहते हैं।” सेवक नाई को बुलाकर ले गया।

बादशाह बहुत खुश हुए। उन्होंने पूछा- “किसने सलाह दी ? तुम तो इतने चतुर

नहीं हो।”

“जहाँपनाह! यह सलाह बीरबल जी ने दी थी।” वह डरते-डरते बोला। बादशाह बड़े प्रसन्न हुए।

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya Hindi (4)


बीरबल को देश निकाला – अकबर बीरबल की मजेदार कहानी


एक बार अकबर बादशाह दरबारियों के साथ दरबार-ए-आम में बैठे थे। तभी महल से उनके लिए बुलावा आया। बादशाह अकबर जैसे ही जाने को तैयार हुए, तभी दूसरा बुलावा आ गया। बुलावा जिन बेगम ने भेजा था, उन्हें बादशाह बहुत प्यार करते थे।

बादशाह जब जल्दी से दरबार से उठकर महल की ओर जाने लगे, तो उन्होंने देखा कि बीरबल मुँह फेरकर मुस्करा रहे हैं। यह देखकर बादशाह को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने हुक्म दिया-“बीरबल ! तुम यहाँ से फौरन चले जाओ और अब इस जमीन पर पैर नहीं रखना, वरना तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।”

बीरबल ने हुक्म मान लिया और नम्रतापूर्वक सलाम करके दरबार से निकल गए। बीरबल के जाने से उसके विरोधी दरबारी खुश हुए और कुछ दरबारी परेशान हुए

Akbar Birbal Ki Majedar Kahaniya

काफी दिन बीत गए, तो बादशाह अकबर का गुस्सा ठंडा हो गया। इधर बीरबल के न होने से दरबार के कामों में बहुत परेशानियाँ आने लगीं तब उन्हें बीरबल न होने का अहसास होने लगा। वह बीरबल को बुलाने के लिए तरकीब सोचने लगे।

एक दिन बादशाह अकबर अपने महल के झरोखे से बाहर का नजारा देख रहे थे कि उन्होंने सामने से एक गाड़ी को आते देखा जिसमें बीरबल बैठे थे। बादशाह ने गाड़ी को हुक्म देकर रुकवा लिया। गाड़ी रुकने पर बादशाह अकबर ने गुस्से में बीरबल से पूछा- “तुमने हमारा हुक्म क्यों टाला है ?”

बीरबल ने नर्म लहजे में जवाब दिया- “जब से आपने मुझे हुक्म दिया कि इस जमीन पर पैर मत रखना, तो मैं उसी दिन से दूर देश जाकर वहाँ की जमीन की मिट्टी को इस गाड़ी पर बिछाकर लाया हूँ।” अब मैं इसी पर रहता हूँ और आपका हुक्म मानता हूँ तथा इसी पर ज़िन्दगी के बाकी दिन गुजार रहा हूँ।

बीरबल की वफादारी पर खुश हो, बादशाह ने उनकी गलती को माफ कर दिया और उन्हें फिर से उनका ओहदा दे दिया।

Akbar Birbal Ki 5 Majedar Kahaniya (5)


बुद्धि की परीक्षा – अकबर बीरबल की मजेदार कहानी


 बुद्धि की परीक्षा

एक बार बीरबल बुखार से पीड़ित होने के कारण हफ्तों तक दरबार में हाजिर न हो सके। बादशाह को बीरबल से कुछ ऐसा स्नेह था कि वे उससे ज्यादा देर अलग नहीं रह सकते थे। एकाएक आज बादशाह बीरबल से मिलने के लिए उतावले हो उठे। वे स्वयं बीरबल के घर आ धमके।

बादशाह ने देखा कि बीमारी के कारण बीरबल कमज़ोर हो गए हैं। कुछ देर बाद बीरबल को हाज, महसूस हुई, वे आज्ञा लेकर पाखाने चले गए।

बादशाह इस बीच में अकेले बैठे थे। उनके मन में आया कि बीमारी के कारण बीरबल की बुद्धि में कोई फर्क तो नहीं आ गया ? ऐसा सोच उन्होंने नौकर को आज्ञा दी कि बीरबल की खाट को चारों पायों के बीच कागज का एक-एक टुकड़ा रख दो। नौकर ने ऐसा ही किया।

कुछ देर बाद जब बीरबल शौचालय से फारिग होकर आये और खाट पर लेट गए। तत्काल ही उन्हें अपनी खाट में कुछ परिवर्तन मालूम होने लगा अतएव वे इधर उधर देखने लगे। कभी दाएं देखते, कभी बाएं।

बादशाह ने उन्हें भुलावे में डालने के लिए इधर-उधर का प्रसंग छेड़ दिया। बीरबल बादशाह की बातों का उत्तर अवश्य दे रहे थे, परन्तु किसी अज्ञात वस्तु की तलाश कर रहे थे।

जब बादशाह से न रहा गया तो बीरबल से उनकी अधीरता का कारण पूछा। तब बीरबल बोले कि इस वक्त मुझे अपनी खाट की स्थिति में हेर-फेर मालूम होता है। बादशाह ने चेहरे पर कृत्रिम आश्चर्य का भाव दिखाते हुए पूछा-“क्या हेर-फेर बीरबल बोले-“ऐसा मालूम होता है कि या तो मकान ही कागज भर नीचे धंस गया है अथवा खाट ही कागज भर ऊँची हो गई है। “

बीरबल का कथन सुन बादशाह समझ गए कि इनकी बुद्धि में किसी किस्म का कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। फिर भी अपना दिल का भाव छिपाकर बोले-” अक्सर) देखा जाता है कि बीमारी से उठने के बाद लोगों को इस तरह के वहम हो जाते हैं। लेकिन असल कुछ होता नहीं है।”

बीरबल बोले-जहाँपनाह! मैं बीमार ज़रूर पड़ा हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि बीमार नहीं है, इसलिए मेरा सोचना गलत नहीं हो सकता। यह बात सुनकर बादशाह ने असल बात प्रकट कर दी और मान गए कि बीरबल की बुद्धि में कोई फर्क नहीं आया है।

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