प्रतिशोध तेनालीराम की कहानी


प्रतिशोध तेनालीराम की कहानी


प्रतिशोध तेनालीराम की कहानीतेनाली राम का असली नाम राम लिंग था। वह एक चतुर और सूझ-बूझ वाला, हर बात को तर्क की कसौटी पर कस कर कहने वाला, सत्यवादी व्यक्ति था।उन दिनों वह विजय नगर के एक प्रांत तेनाली में अपने परिवार, माँ और पत्नी के साथ रहता था। उसके एक ही संतान थी जो कि बेटा था। राम लिंग ने सुन रखा था कि राजा कृष्णदेव राय बुद्धिमानों व गुणवानों का आदर करते हैं। उसे भी अपने बुद्धि बल पर बड़ा भरोसा था, अतः वह अक सोचता कि क्यों न मैं भी दरबार में जाकर अपना भाग्य आजमाऊँ ?

लेकिन सीधे-सीधे राजा के पास नहीं पहुँचा जा सकता था। अतः वह किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से भेंट होने के अवसर की ताक में रहने लगा संयोग से उन्हीं दिनों राजगुरु ताताधारी का तेनाली के पास मंगलगिरी नाम के स्थान पर आना हुआ। वहाँ जाकर राम लिंग ने उनकी बड़ी सेवा की और अपनी इच्छा व्यक्त की। राजगुरु देख चुका था कि तेनाली का यह रामलिंग बड़ा ही बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति है। ऐसे चतुर व्यक्ति को राजगुरु और उसके दल, जिसमें कई मंत्री और सेनापति तक शामिल थे. के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता था।

अतः टालने की गरज से उसने कहा ‘जब भी मुझे लगा कि अवसर उचित है, मैं राजा से तुम्हारा परिचय करवाने के लिए बुलवा लूंगा।” चिंता मत करो। राज्य को जैसे बुद्धिमानों की सदा आवश्यकता रहती है और महाराज तो गुणी एवं बुद्धिमानी के कद्रदान हैं ही।

प्रतिशोध तेनालीराम की कहानी- तेनाली राम की कहानियाँ | Tenaliram ki kahaniya in Hindi

यह आश्वासन पाकर राम लिंग बहुत प्रसन्न हुआ। राजगुरु चले गए और राम लिंग राजगुरु के बुलावे की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगा, लेकिन बुलावा न आना था, न आया। लोग रामलिंग से हँस कर पूछते, “क्यों भाई! रामलिंग! कब जा रहे हो राजधानी ?”

कोई कहता, मैंने सुना है तुम्हें विजय नगर बुलाने के लिए राजा ने विशेष दूत भेजा है। जब तेनाली राम का विश्वास राजगुरु पर से उठ गया तो वह स्वयं ही एक दिन राजधानी जा पहुँचा और वहां राजगुरु से मिला, जिसने उसे पहचानने से भी इंकार कर दिया। इससे तेनाली राम क्षुब्ध हो उठा और राजगुरु को सबक सिखाने की ताक में रहने लगा।

फिर एक दिन उसे अवसर मिल गया। एक बार राजगुरु नदी पर नहाने गया। किनारे पर उसने वस्त्र उतार कर रखे और पानी में उतर गया। तेनाली राम उसके पीछे लगा ही हुआ था।

जैसे ही राजगुरु ने नाक बंद करके पानी में गोता लगाया, वैसे ही तेनाली राम ने उसके कपड़े उठा लिए और जाकर एक पेड़ के पीछे छिप गया। नहा-धोकर जब राजगुरु किनारे की ओर बढ़ा तो किनारे पर अपने कपड़े न पाकर चौंक गया। उसने सोचा, कपड़े कहाँ गए ? अवश्य ही किसी ने शैतानी की है। फिर वह जोर से चिल्लाया

‘अरे मेरे वस्त्र किसने उठाए हैं ? देखो, सीधी तरह मेरे वस्त्र लौटा दो वरना राजदण्ड दिया जाएगा।” यह सुनकर तेनाली राम सामने आ गया। “ओह ! रामलिंग… अरे भई मजाक छोड़ो और मेरे वस्त्र दो। देखो, मैं तुम्हें

महाराज तक अवश्य पहुंचाऊंगा।” “तुम एक नम्बर के झूठे हो राजगुरु ! आज तक तुम मुझे झूठे आश्वासन देते रहे हो। अब तुम्हारी सज़ा यही है कि तुम एक लंगोट में ही अपने घर जाओ ताकि विजय नगर की जनता तुम्हारी असलियत जान ले। “

‘अरे भई तेनाली इस बार मैं पक्का वादा करता हूँ।” “तो वादा करो कि तुम मुझे अपने कंधों पर बैठाकर इसी समय राजमहल लेकर चलोगे।”

उसकी बात सुनते ही राजगुरु को क्रोध आया-“कंधे पर बैठाकर ? कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए रामलिंग।”

“हां तुम्हारे झूठे आश्वासन पा-पाकर पागल ही हो गया हूँ। मेरी शर्त मंजूर हो

तो बोलो, वरना मैं तो चला अपने रास्ते पर। ” ” अरे नहीं नहीं। मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।” घबरा कर राजगुरु बोला

“लाओ मेरे वस्त्र दो।”

तेनाली राम ने उसके वस्त्र दे दिए।

राजगुरु ने बाहर आकर जल्दी-जल्दी वस्त्र पहने, फिर उसे अपने कंधों पर बैठा कर राजमहल की ओर चल दिया। जब राजगुरु नगर में पहुँचा तो लोग यह विचित्र दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए और सोचने लगे कि यह कौन है जिसे राजगुरु जैसा अपने कंधों पर बैठाकर ढो रहा है ? बच्चे और तरुण इस दृश्य को देख कर विशेष आनन्दित हुए और बिना कोई विचार किए सीटियां और तालियाँ बजाते उनके पीछे-पीछे चलने लगे। साथ ही वे कहते जा रहे थे-राजगुरु का जलूस देखो राजगुरु का जलूस।”

प्रतिशोध तेनालीराम की कहानी  …..

राजगुरु अपमान की आग में जला जा रहा था और सोच रहा था कि इसे महाराज से मृत्यु दण्ड दिलवाएगा। धीरे-धीरे भीड़ राजमहल के करीब पहुंच गई। महाराज भी अपने कक्ष से निकल कर बरामदे में आए और जैसे ही उन्होंने में बाहर का नज़ारा देखा, स्तब्ध रह गए। राजगुरु एक व्यक्ति को कंधे पर उठाए लिए चले आ रहे हैं, लज्जा से उनका सिर झुका हुआ है। पीछे आते लोग उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं और कंधे पर बैठा व्यक्ति हंस रहा है।

राजगुरु का ऐसा अपमान होते देख कर महाराज को अत्यधिक क्रोध आया। उन्होंने दो सिपाहियों को आदेश दिया कि जो व्यक्ति कंधों पर बैठा है, उसकी मुक्कों-लातों से खूब पिटाई करके छोड़ दो और दूसरे व्यक्ति को सम्मान सहित हमारे पास ले आओ।

राजगुरु तो सिर झुका होने के कारण महाराज को नहीं देख पाया, मगर तेनाली राम ने देख लिया कि उनकी ओर इशारा करके महाराज सिपाहियों से कुछ कह रहे।

तेनाली राम फौरन भांप गया कि दाल में कुछ काला है। में वह जल्दी से राजगुरु के कंधे से उतरा और उससे क्षमा मांगने लगा। क्षमा मांग कर उसने फौरन राजगुरु को अपने कंधे पर उठा लिया और उनकी जय-जयकार करने लगा। उसे इस प्रकार करते देखकर जनता भी राजगुरु की जय-जयकार करने लगी।

तभी राजा के सिपाही वहाँ आ पहुँचे और जैसी कि महाराज की आज्ञा थी. उन्होंने राजगुरु को तेनाली राम के कंधे से नीचे उतार लिया और बुरी तरह उनकी पिटाई करने लगे।

राजगुरु पीड़ा और अपमान से चीखने लगा। सिपाहियों ने उसकी खूब पिटाई की, फिर तेनाली राम से बोले – ” आइये आपको महाराज ने बुलाया है।” राजगुरु हैरान था कि यह सब क्या हुआ। महाराज ने मेरी पिटाई का आदेश देकर तेनाली को सम्मान सहित राजमहल में क्यों बुलवाया है।

सिपाही तेनाली राम को लेकर महाराज के पास पहुँचे तो राजगुरु के स्थान पर तेनाली राम को देखकर महाराज भी बौखलाए- “यह किसे ले आए। हमने कहा था कि ऊपर वाले की पिटाई करें और नीचे वाले को ले आएं।”

“ये नीचे वाले ही हैं महाराज ! वो शैतान इन्हीं के कन्धों पर बैठा था।” ‘ओह ! इसका मतलब यह व्यक्ति बहुत चालाक है। इसने पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि क्या हो सकता है। इसे ले जाकर मौत के घाट उतार दो। इसने राजगुरु का अपमान किया है और हां, इसके खून से सनी तलवार सरदार को दिखा देना।”

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उस समय तक वहाँ पर कुछ दरबारी भी आ गए थे। वे ऊपर से तो गंभीर थे, लेकिन राजगुरु की अच्छी दुर्गति होने पर वे भी मन ही मन खुश थे और प्रशंसापूर्ण नज़रों से तेनाली राम को देख रहे थे। अतः जब सैनिक तेनाली राम को लेकर चल तो कुछ दरबारी खामोशी से उसके पीछे हो लिये। एक स्थान पर जाकर उन्होंने तेनाली राम से असली किस्सा पूछा तो पता चला कि राजगुरु दोषी हैं और तेनाली राम निर्दोष। तब उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि इस व्यक्ति को किसी प्रकार राज दरबार में लाया जाए ताकि राजगुरु और दूसरे बेईमान दरबारियों को सबक सिखाया जाए।

उन्होंने तेनाली राम से दोनों सैनिकों को दस-दस स्वर्ण मुद्राएं दिलवा कर और वादे के साथ उसे घुड़वा लिया कि फिलहाल वह शहर छोड़कर चला जाएगा।

फलस्वरूप, सिपाहियों ने एक बकरे को मार कर उसके खून से सनी तलवारें सरदार को दिखा दीं।

तेनालीराम को जहाँ जान बचने की खुशी थी, वहीं बीस स्वर्ण मुद्राओं के जाने का दुःख भी था । मगर वह भी इस प्रकार चुप बैठने वाला नहीं था। उसने अपने घर जाकर अपनी माँ और पत्नी को सिखा-पढ़ाकर महल में भेज दिया।

दोनों सास-बहू महाराज के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगीं। ‘क्या बात है ? तुम कौन हो और यहाँ आकर इस प्रकार क्यों रो रही हो ?” महाराज ने पूछा।

‘महाराज एक छोटे से अपराध के लिए आपने मेरे बेटे रामलिंग को मृत्युदंड दे दिया। उसके इस दुनिया से चले जाने के बाद मैं किसके सहारे जीऊंगी ? कौन होगा मेरे बुढ़ापे का सहारा ?” कहकर उसकी माँ सिसककर रोने लगी। ‘और मेरे इन मासूम बच्चों का क्या होगा महाराज- मैं अबला इन बच्चों और बूढ़ी सास का पेट कैसे पालूंगी।”

महाराज को तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ कि उस छोटी-सी भूल की उसे इतनी बड़ी सज़ा नहीं देनी चाहिए थी। मगर अब हो भी क्या सकता था। उन्होंने आज्ञा दी- “इन्हें हर माह दस स्वर्ण मुद्राएं दी जाएं। जिससे ये अपना व बच्चों का भरण-पोषण कर सकें।”

दस स्वर्ण मुद्राएं तत्काल लेकर दोनों सास-बहू घर पहुँची और तेनाली राम को पूरी बात बताई । तेनाली राम खूब हंसा-“चलो दस स्वर्ण मुद्राएं अगले माह मिल जाएंगी- हिसाब बराबर…………

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